मृत्यु की आहट के बीच संवेदनहीन होता समाज और आत्मविनाश की राह

जीवन का सबसे बड़ा सत्य मृत्यु है। जिसने जन्म लिया है, उसका एक दिन इस संसार से जाना निश्चित है। फिर भी पिछले कुछ वर्षों में ऐसा प्रतीत होता है कि असमय होने वाली मौतों की खबरें हमारे आसपास तेजी से बढ़ी हैं। कभी सड़क दुर्घटना, कभी हृदयाघात, कभी किसी गंभीर बीमारी का अचानक हमला, तो कभी कोई अप्रत्याशित हादसा—हर दिन किसी न किसी परिचित या अपरिचित के चले जाने का समाचार मन को झकझोर देता है। सोशल मीडिया ने इन घटनाओं को और अधिक हमारे सामने ला दिया है, जिससे जीवन की क्षणभंगुरता का एहसास पहले से कहीं अधिक गहरा हो गया है।
लेकिन इस कठोर सच्चाई के समानांतर एक और चिंताजनक प्रवृत्ति भी बढ़ती दिखाई देती है—मानवीय संवेदनाओं का क्षरण। ऐसा लगता है कि मृत्यु की निकटता का बोध भी मनुष्य को विनम्र नहीं बना पा रहा। इसके विपरीत, अनेक लोग ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और दूसरों को हर हाल में नीचा दिखाने की मानसिकता में डूबते जा रहे हैं। मानो जीवन का उद्देश्य स्वयं आगे बढ़ना नहीं, बल्कि किसी और को पीछे धकेलना रह गया हो।
संघर्ष, प्रतिस्पर्धा और उत्कृष्टता की चाह समाज की प्रगति के लिए आवश्यक हैं। स्वस्थ प्रतियोगिता व्यक्ति को बेहतर बनने की प्रेरणा देती है और राष्ट्र के विकास में योगदान करती है। किंतु जब प्रतिस्पर्धा दुर्भावना में बदल जाती है, तब उसका स्वरूप विनाशकारी हो जाता है। किसी की प्रतिष्ठा धूमिल करने के लिए झूठ फैलाना, षड्यंत्र रचना, अफवाहें फैलाना, चरित्रहनन करना, झूठे आरोप लगाना या किसी के अवसर छीनने का प्रयास करना—ये केवल अनैतिक कृत्य नहीं हैं, बल्कि सामाजिक विश्वास को नष्ट करने वाले अपराध भी हैं।
ऐसी प्रवृत्ति वाले लोग अक्सर यह भ्रम पाल लेते हैं कि दूसरे को गिराकर वे स्वयं ऊँचे उठ जाएंगे। वे क्षणिक सफलता के लिए छल, कपट और दुष्प्रचार का सहारा लेते हैं। परंतु इतिहास और समाज दोनों गवाही देते हैं कि झूठ और अन्याय की नींव पर खड़ी कोई भी उपलब्धि स्थायी नहीं होती। देर-सवेर सत्य सामने आता है और तब सबसे अधिक क्षति उसी व्यक्ति की विश्वसनीयता, सम्मान और मानसिक शांति को होती है जिसने दूसरों को नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया था।
दूसरों को अपमानित करने या उनका अस्तित्व मिटाने की कोशिश का एक और दुष्परिणाम यह है कि यह मानसिकता धीरे-धीरे व्यक्ति के भीतर स्थायी असुरक्षा और भय पैदा कर देती है। जो दूसरों के लिए षड्यंत्र रचता है, वह स्वयं भी हर समय शंका में जीता है। उसे हर व्यक्ति प्रतिद्वंद्वी दिखाई देता है, हर सफलता से ईर्ष्या होती है और हर आलोचना शत्रुता लगती है। परिणामस्वरूप उसका अपना जीवन तनाव, अविश्वास और अकेलेपन से भर जाता है।
समाज के स्तर पर भी इसके गंभीर परिणाम सामने आते हैं। कार्यस्थलों पर सहयोग समाप्त होने लगता है, संस्थानों में योग्यता के बजाय गुटबाजी बढ़ती है, परिवारों में रिश्ते टूटते हैं और सार्वजनिक जीवन में विश्वास का संकट पैदा होता है। जब लोग यह मानने लगते हैं कि सफलता का रास्ता परिश्रम नहीं बल्कि किसी दूसरे को बदनाम करना है, तब पूरी व्यवस्था की नैतिक नींव कमजोर होने लगती है।
भारतीय चिंतन सदैव यह कहता आया है कि कर्म का फल अवश्य मिलता है। यदि हम किसी के लिए अन्याय, अपमान या पीड़ा का कारण बनते हैं, तो उसका प्रभाव किसी न किसी रूप में हमारे अपने जीवन पर भी पड़ता है। यह केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सत्य भी है। द्वेष से जन्मे कर्म अंततः द्वेष ही लौटाते हैं, जबकि सद्भाव और सहयोग से बने संबंध कठिन समय में सबसे बड़ा सहारा बनते हैं।
आज जब हर दिन हमें जीवन की अनिश्चितता का एहसास हो रहा है, तब आवश्यक है कि हम अपने व्यवहार का भी आत्ममंथन करें। यदि कल का कोई भरोसा नहीं, तो क्यों न आज किसी का सम्मान करें, किसी की सहायता करें, किसी की सफलता से प्रसन्न होना सीखें और असहमति के बावजूद मर्यादा बनाए रखें? किसी को गिराने में खर्च की गई ऊर्जा यदि स्वयं को बेहतर बनाने में लगाई जाए, तो व्यक्ति भी आगे बढ़ेगा और समाज भी।
अंततः मनुष्य अपने पद, संपत्ति या प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और कर्मों से याद किया जाता है। जो दूसरों के लिए सम्मान, विश्वास और सद्भाव छोड़ जाता है, वही वास्तव में सफल है। और जो दूसरों को मिटाने की कोशिश में अपना जीवन व्यतीत करता है, वह अक्सर यह भूल जाता है कि घृणा की आग सबसे पहले उसी हाथ को जलाती है जो उसे प्रज्वलित करता है।
शायद समय की सबसे बड़ी सीख यही है—मृत्यु निश्चित है, पर हमारे कर्म और हमारी संवेदनाएँ ही तय करती हैं कि जीवन सार्थक था या केवल संघर्षों, अहंकार और वैमनस्य में व्यर्थ चला गया। इसलिए प्रतिस्पर्धा करें, पर निष्पक्षता के साथ; सफलता प्राप्त करें, पर नैतिकता के साथ; और ऐसा समाज बनाएं जहाँ किसी को गिराने के बजाय एक-दूसरे को उठाने की संस्कृति विकसित हो। यही सच्ची मानवता है और यही सभ्यता की वास्तविक पहचान।

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