*सात मोड़ पर खड़ा प्रश्न.. ढूंढ रहा है उत्तर…..*

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*प्रो. राकेश चन्द्र रयाल (मनरागी)
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ऋषिकेश–देहरादून की उस राह पर, सात मोड़ ज़ब सवाल बन गया,
पेड़ों की छाया के नीचे जैसे पूरा उत्तराखंड खड़ा हो गया।

एक ओर विकास के सपने थे, चौड़ी सड़क, तेज़ रफ़्तार की थी चाह,
दूसरी ओर वर्षों से खड़े वृक्ष थे, धरती की साँस, थी प्रकृति की पनाह।

नारे बहुत थे, मंच भी खूब सजे,भाषणों का भी था अपना शोर,
पर मन पूछता रहा बार-बार—क्या सचमुच पेड़ों के लिए था यह शोर?

जो कल तक हर परियोजना के साथ थे, अचानक वन के प्रहरी बन बैठे,
और जो हरियाली की बात करते थे, विकास के नाम पर मौन क्यों बैठे?

यदि सच में वृक्षों से प्रेम था, विकास की भी चाह थी, तो विकल्पों की बात भी होती,
सड़क चौड़ी भी होती, नए पौधे भी होते, प्रकृति की मुस्कान भी न खोती।

यदि विकास ही अंतिम लक्ष्य होता, तो संवेदना भी साथ चलती,
हर कटते तने के बदले नई हरियाली भी पलती।

पर यदि यह केवल विरोध था, तो प्रश्न उत्तराखंड अवश्य करेगा,
क्या हर आंदोलन जनहित होगा, या राजनीति का मंच बनेगा?

जनप्रिय होने की होड़ लगी थी, हितैषी कहलाने की थी सबको चाह,
पर उत्तराखंड देख रहा था, किसके मन में झूठ है, किसके मन में सच की थी राह।

पहाड़ सिखाते हैं संतुलन, न अंधा विकास और न विरोध,
जहाँ सड़क भी आगे बढ़ती हो, और हरियाली संग जीवन रहे प्रबोध।

विकास आवश्यक, पर्यावरण अनिवार्य दोनों विरोधी नहीं, पूरक हैं,
भविष्य उसी का सुरक्षित होगा, जिसके निर्णय दूरदर्शी और विवेक के पूरक हैं।

आओ ऐसा मार्ग चुनें, जहाँ न विकास की गति रुके और न प्रकृति रोए,
जहाँ सड़कें भी भविष्य लिखें, और देवदार भी आकाश छुएँ।

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