उस मुस्कान को पढ़ नहीं पाए हम…

डॉ. राकेश चन्द्र रयाल (मनरागी)

तस्वीर में एक मुस्कान है, सहज, सामान्य और बिल्कुल साधारण। लेकिन शायद उस मुस्कान के पीछे एक ऐसा दर्द छिपा था, जिसे कोई पढ़ नहीं पाया।
यह तस्वीर 65 वर्षीय राम सिंह कोरंगा जी की है। काठगोदाम के गौला बायपास पुल पर बारिश के बीच खड़े राम सिंह जी से एक राहगीर ने सहजता से पूछा “चचा, बारिश में क्यों भीग रहे हो?” उन्होंने हल्की-सी मुस्कान दी और अगले ही पल उफनती गौला नदी में छलांग लगा दी।
पुलिस की शुरुआती जांच में सामने आया कि राम सिंह जी पहले टैक्सी चलाते थे। करीब एक साल पहले तबीयत खराब होने के कारण काम छोड़ दिया था और तब से बेरोजगार थे। घटना से पहले घर में पारिवारिक विवाद भी हुआ था। इसके बाद वे घर से निकल गए।

इन परिस्थितियों को उनके अंतिम कदम का पूरा कारण मान लेना उचित नहीं होगा। किसी व्यक्ति के भीतर चल रहा संघर्ष बाहर से दिखाई देने वाली घटनाओं से कहीं अधिक जटिल हो सकता है। लेकिन यह घटना हमें एक जरूरी सवाल जरूर देती है, क्या हम अपने आसपास के लोगों को सचमुच देख पाते हैं?
कई बार इंसान भीतर से टूट रहा होता है, फिर भी सामान्य दिखता है। वह हंसता है, बातचीत करता है और अपनी तकलीफ छिपाए रखता है। इसलिए किसी की मुस्कान को उसकी खुशहाली का प्रमाण मान लेना हमेशा सही नहीं।
राम सिंह जी की तस्वीर को देखकर मन में बस यही आता है, काश, उस राहगीर ने एक पल और रुककर पूछा होता, “चचा, सब ठीक तो है?”
शायद उस सवाल का जवाब कुछ बदल पाता, शायद नहीं। हम यह कभी नहीं जान पाएंगे।
लेकिन हम इतना जरूर कर सकते हैं कि अपने आसपास के लोगों की खामोशी को अनदेखा न करें। किसी बुजुर्ग के पास बैठें, किसी दोस्त को फोन करें, किसी सहकर्मी से हाल पूछें और जब कोई अपने मन की बात कहे, तो उसे सिर्फ सुन लें।
क्योंकि कभी-कभी किसी इंसान को समाधान से पहले सिर्फ एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है, जो उसकी बात सुन सके।
चेहरे की हंसी को ही किसी का सच मत समझिए।
इस घटना से हमें यही सीख मिलती है कि –
कभी उसकी खामोशी को भी सुनने की कोशिश कीजिए।

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