भाषाएँ केवल शब्द नहीं गढ़तीं, वे समाज के चरित्र भी दर्ज करती हैं। गढ़वाली का एक ऐसा ही शब्द है—‘चकडैत’।
हिंदी में इसके अर्थ को समझाने के लिए कई शब्दों की जरूरत पड़ेगी—चमचा, चाटुकार, चापलूस, चुगलखोर और चालाक। यानी हिंदी के पाँच ‘सी’—चमचागिरी, चाटुकारिता, चापलूसी, चुगली और चालाकी—एक ही व्यक्ति में समा जाएँ, तो गढ़वाली उसे बड़े सलीके से कहती है—चकडैत।
चकडैत साधारण चापलूस नहीं होता। वह सामने वाले की महत्ता को उसकी वास्तविक ऊँचाई से कई गुना बढ़ाकर प्रस्तुत करता है। आपने मामूली काम किया तो वह उसे ऐतिहासिक उपलब्धि बना देगा। आपकी सामान्य-सी बात में वह दूरदर्शिता खोज लेगा। प्रशंसा उसके लिए केवल प्रशंसा नहीं, काम निकालने की निवेश राशि है।
उसकी दूसरी विशेषता है—परिस्थिति के अनुसार रंग बदलने की कला।
साहब के सामने—
“आप जैसा दूरदर्शी अधिकारी कोई नहीं।”
साहब के जाते ही—
“इनको क्या पता, सब मेरी सलाह से हुआ है।”
और साहब अचानक लौट आएँ तो—
“मैं तो यही कह रहा था कि साहब जैसा निर्णय कोई नहीं ले सकता!”
चकडैत की भाषा में स्थायी सत्य जैसा कुछ नहीं होता; सत्य का संस्करण श्रोता के अनुसार बदलता रहता है।
चुगली उसकी तीसरी आँख है। उसे मालूम रहता है कि किसकी किससे नहीं बनती, कौन किससे नाराज है और किसकी बात कहाँ पहुँचानी है। उसका प्रसिद्ध वाक्य होता है—
“मैं तो किसी से कहता नहीं, आपको अपना समझकर बता रहा हूँ…”
इसके बाद कोई बात ‘गुप्त’ नहीं रहती।
चकडैत की असली प्रतिभा यह है कि वह चुगली को सूचना और स्वार्थ को सेवा बनाकर पेश करता है। वह जिस व्यक्ति की अनुपस्थिति में आपके सामने बुराई करता है, उसी की अनुपस्थिति में आपके बारे में भी किसी और को बता सकता है। उसके लिए न मित्र स्थायी होते हैं, न विरोधी—स्थायी केवल उसका स्वार्थ होता है।
और काम निकलवाने की कला में वह अद्वितीय होता है। किससे कितना झुकना है, किसके सामने कितनी प्रशंसा करनी है और किस समय किसकी ‘सेवा’ करनी है—उसे इसका सहज ज्ञान होता है। उसका व्यवहार सिद्धांत पर नहीं, उपयोगिता पर आधारित होता है।
आज के डिजिटल युग में चकडैत को आप एक चलता-फिरता सोशल नेटवर्क भी कह सकते हैं। उसके पास हर व्यक्ति की खबर होती है, हर खबर में थोड़ा मसाला और हर मसाले के पीछे कोई उद्देश्य।
फिर भी चकडैत को पहचानना आसान नहीं। वह प्रायः मीठा बोलता है, विनम्र रहता है और हर किसी की खूबियाँ गिनाता है। उसका स्वार्थ अक्सर शिष्टाचार की पैकिंग में आता है।
शायद यही कारण है कि चकडैत केवल एक व्यक्ति नहीं, एक सामाजिक प्रवृत्ति है—जहाँ बुद्धि का उपयोग सृजन के बजाय स्वार्थ के लिए, वाणी का उपयोग सत्य के बजाय प्रभाव के लिए और संबंधों का उपयोग आत्मीयता के बजाय लाभ के लिए होने लगे।
इसलिए—
चमचागिरी + चाटुकारिता + चापलूसी + चुगली + चालाकी
= चकडैत।
गढ़वाली ने पाँच ‘सी’ को एक शब्द में समेट दिया।
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