


हल्द्वानी, 9 सितम्बर 2026। उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय में हिमालय दिवस के अवसर पर 9 सितम्बर 2026 को विश्वविद्यालय के विज्ञान ब्लॉक में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण, जैव विविधता, संसाधन प्रबंधन तथा सतत विकास से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञों एवं शिक्षकों ने विचार साझा किए।
कार्यक्रम का शुभारम्भ निदेशक अकादमिक प्रो. पी.डी. पंत के उद्घाटन संबोधन से हुआ। उन्होंने हिमालय को ‘एशिया का जल स्तंभ’ बताते हुए कहा कि हिमालय का संरक्षण आज की अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हिमालय की प्रकृति, पारिस्थितिकी एवं संवेदनशीलता की समुचित समझ के बिना विकास की प्रभावी योजना संभव नहीं है। उन्होंने वर्तमान पीढ़ी से आग्रह किया कि विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए हिमालय को बेहतर स्थिति में संरक्षित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. शेर सिंह सामंत, वरिष्ठ वैज्ञानिक, उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय एन.एस.ए.आई. एवं एच.एफ.आर.आई. के पूर्व निदेशक, का स्वागत किया गया। उन्होंने ‘हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण एवं प्रबंधन की आवश्यकता’ विषय पर विशेष प्रस्तुतीकरण दिया। उन्होंने कहा कि हिमालय के संरक्षण एवं प्रबंधन के लिए व्यवस्थित एवं दीर्घकालिक अध्ययन आवश्यक है, क्योंकि हिमालयी क्षेत्र से संबंधित आंकड़े अत्यंत विविध एवं व्यापक हैं। उन्होंने जैव विविधता की समझ को सफल संरक्षण की आधारशिला बताते हुए कहा कि संरक्षण की रणनीतियों में विविधता को केंद्र में रखना आवश्यक है।
डॉ. सामंत ने हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के समक्ष उपस्थित प्रमुख खतरों पर विस्तार से चर्चा की तथा संरक्षण के विभिन्न उपायों एवं मॉडलों के उदाहरण प्रस्तुत किए। इनमें एक्स-सीटू संरक्षण (Ex-situ Conservation), पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर, संरक्षण प्रयासों में Ecological Niche Modelling तथा आर्बोरेटम जैसी पहलें शामिल रहीं। उन्होंने दीर्घकालिक पारिस्थितिक निगरानी, संरक्षण शिक्षा, सिटिजन साइंस को बढ़ावा देने तथा स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी को हिमालय संरक्षण के लिए आवश्यक बताया।
इस अवसर पर अनुसंधान निदेशालय के प्रमुख प्रो. गिरिजा पाण्डे ने वर्तमान समय में सामने आ रही जलवायु संबंधी आपदाओं की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि पर्यावरणीय खतरों के विश्लेषण को नीति निर्माण का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विकास की वर्तमान अवधारणा मुख्यतः राजनीतिक अर्थव्यवस्था से संचालित होती है और शहरी एवं औद्योगिक विकास का ग्रामीण विकास के साथ समुचित समन्वय न होने के कारण ‘प्रचुरता के बीच गरीबी’ जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई हैं। उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के कारण उत्पन्न होने वाले संघर्षों का उल्लेख करते हुए संसाधनों के विवेकपूर्ण एवं सतत प्रबंधन की आवश्यकता पर बल दिया।
विश्वविद्यालय के माननीय कुलसचिव ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कहा कि “हम हिमालय का हिस्सा हैं और हिमालय हमारे अस्तित्व का आधार है।” उन्होंने हिमालयी पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी की रक्षा को प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व बताते हुए संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम का संयोजन डॉ. बीना तिवारी फुलारा एवं डॉ. प्रीति पंत द्वारा किया गया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी एवं अन्य अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित रहे। समारोह ने हिमालय के संरक्षण के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जनभागीदारी और दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रतिबद्धता की आवश्यकता को रेखांकित किया।
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