कोलंबो में आयोजित सस्टेनेबल ग्लोबल समिट में हिमालयी पारंपरिक ज्ञान, भोटिया जनजाति की जीवनशैली और औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण पर किया शोधपत्र प्रस्तुत
रामनगर। पीएनजी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रामनगर के डॉ. महेंद्र पाल सिंह परमार ने श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में आयोजित सस्टेनेबल ग्लोबल समिट में उत्तराखंड की समृद्ध स्वदेशी ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत कर प्रदेश और महाविद्यालय का गौरव बढ़ाया है। उन्होंने अपने शोध के माध्यम से हिमालयी क्षेत्र में पीढ़ियों से संरक्षित पारंपरिक ज्ञान, प्रकृति के साथ समुदायों के सह-अस्तित्व और जैव विविधता संरक्षण में स्थानीय अनुभवों की महत्ता को रेखांकित किया।
डॉ. परमार ने अपने शोध में उत्तरकाशी जनपद के गंगोत्री क्षेत्र की पारंपरिक ज्ञान परंपराओं, भोटिया जनजाति की जीवनशैली तथा औषधीय वनस्पतियों के पारंपरिक उपयोग पर विशेष रूप से प्रकाश डाला। उन्होंने हर्षिल, बागोरी, नीलोंग और जादुंग जैसे सीमांत क्षेत्रों के स्थानीय समुदायों के प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव तथा प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग से संबंधित अनुभवों को शोध के माध्यम से प्रस्तुत किया।
उनकी प्रस्तुति का प्रमुख आकर्षण हिमालयी जड़ी-बूटियों की पहचान, उनके पारंपरिक औषधीय उपयोग और संरक्षण से संबंधित स्थानीय समुदायों का पारंपरिक ज्ञान रहा। उन्होंने बताया कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता यह अनुभवजन्य ज्ञान केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं, बल्कि जैव विविधता के संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग और सतत विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
डॉ. परमार की इस अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहभागिता पर उच्च शिक्षा निदेशक प्रो. आनंद सिंह उनियाल, महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एम.सी. पांडे तथा वनस्पति विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शलभ गुप्ता ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।
प्राचार्य प्रो. एम.सी. पांडे ने इसे महाविद्यालय के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि इस प्रकार की अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहभागिताएं संस्थान की शोध एवं अकादमिक पहचान को व्यापक आयाम प्रदान करती हैं। वहीं, डॉ. शलभ गुप्ता ने डॉ. परमार के शोध प्रयासों की सराहना करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
महाविद्यालय परिवार ने विश्वास व्यक्त किया कि डॉ. परमार की यह उपलब्धि उत्तराखंड की समृद्ध पारंपरिक ज्ञान संपदा को वैश्विक पहचान दिलाने के साथ-साथ स्थानीय ज्ञान, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बीच संबंधों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सार्थक विमर्श को भी प्रोत्साहित करेगी।
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