अपनत्व की चौपाल: मंगलानंद चाचा की जीवंत विरासत

अपनत्व की चौपाल: मंगलानंद चाचा की जीवंत विरासत
“उनकी दुकान आज भी जैसे यादों में बसी है—जहां चश्मों के साथ रिश्तों की दृष्टि भी साफ होती थी।
चाचा-चाची का स्नेह ऐसा था, मानो हर आने वाला अपना ही हो, और हर मुलाकात एक पारिवारिक उत्सव बन जाती थी।”
दोगी पट्टी के नसोगी गांव से निकलकर ऋषिकेश तक अपनी पहचान बनाने वाले मंगलानंद चाचा जी की कहानी केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं, बल्कि अपनत्व, संघर्ष और सामाजिक जुड़ाव की एक जीवंत मिसाल है, जो समय के साथ और भी अधिक गहरी होती जा रही है।
नसोगी गांव, जहां रयाल परिवार की जड़ें गहरी थीं, वहीं रेवत राम जी के पुत्र मंगलानंद रयाल ने कम उम्र में ही जीवन की राह स्वयं तलाशने का साहस दिखाया। चार भाइयों में वे तीसरे स्थान पर थे। घर की सीमाओं से बाहर निकलकर उन्होंने रोजगार की खोज में देश के विभिन्न हिस्सों का रुख किया, लेकिन मन को कहीं स्थायित्व नहीं मिला।
उनकी कर्मयात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव अविभाजित भारत के उस हिस्से में रहा, जो आज पाकिस्तान में स्थित क्वेटा है। वहीं उन्होंने चश्मों (ऑप्टिकल) के कार्य की बारीकियां सीखीं। यह केवल एक पेशा नहीं था, बल्कि आगे चलकर लोगों की दृष्टि के साथ-साथ रिश्तों को भी स्पष्ट करने का माध्यम बन गया।
अंततः वे अपने पहाड़ के समीप बसे आध्यात्मिक नगर ऋषिकेश पहुंचे और यहीं अपनी स्थायी पहचान बनाई। चन्द्रभागा पुल के पास, टिहरी बस अड्डा रोड तिराहे पर स्थित उनकी छोटी-सी दुकान धीरे-धीरे एक विशिष्ट पहचान बन गई। यहां केवल चश्मे नहीं बनते थे—यहां संबंध बनते थे, संवाद होते थे और अपनापन जिया जाता था।
मंगलानंद चाचा जी का स्वभाव अत्यंत सरल, मिलनसार और आत्मीय था। उनकी मधुर वाणी और सहज व्यवहार उनकी पहचान थे। उनकी दुकान पर बैठना मानो किसी अपने के आंगन में बैठने जैसा अनुभव देता था। नसोगी गांव ही नहीं, पूरी दोगी पट्टी के लोग वहां आकर समय बिताते, बातचीत करते और अपनत्व का अहसास लेकर लौटते थे। उनकी दुकान वास्तव में एक “चौपाल” बन चुकी थी—जहां हर व्यक्ति का स्वागत था।
इस चौपाल की आत्मा थीं उनकी धर्मपत्नी, चाची गैणादेवी। उनका स्नेह और आतिथ्य इस पूरे परिवेश को पूर्णता प्रदान करता था। जो भी व्यक्ति दुकान से उनके घर तक पहुंचता, वह केवल अतिथि नहीं रहता—वह परिवार का हिस्सा बन जाता। चाची जी के हाथों का भोजन केवल स्वाद नहीं, बल्कि प्रेम, अपनत्व और आत्मीयता का प्रसाद होता था।
पौड़ी जनपद के यमकेश्वर क्षेत्र के सिंदूड़ी गांव से आईं चाची जी ने इस घर को वास्तव में एक आश्रय बना दिया था। कहा जाता है कि नसोगी गांव का शायद ही कोई व्यक्ति, जिसकी उम्र आज 45 वर्ष से अधिक हो, ऐसा होगा जिसने उनके हाथों का स्नेहपूर्ण भोजन न चखा हो।
मंगलानंद चाचा जी के चार पुत्र और चार पुत्रियां थीं। जीवन ने जहां उन्हें अपार स्नेह और सम्मान दिया, वहीं कुछ गहरे दुःख भी दिए। कोविड काल में एक पुत्र और एक पुत्री का असमय निधन पूरे परिवार के लिए एक अपूरणीय क्षति थी।
आज उनके बड़े पुत्र भगवती रयाल तथा स्वर्गीय संजीव रयाल के पुत्र इस पारिवारिक ऑप्टिकल व्यवसाय को आगे बढ़ा रहे हैं। वहीं राजीव रयाल और कमल अन्य क्षेत्रों में अपने जीवन को सफलतापूर्वक आगे बढ़ा रहे हैं। उनके भीतर आज भी वही संस्कार, वही अपनापन और वही व्यवहार जीवित है, जो उन्होंने अपने माता-पिता से पाया।
समय बदल गया है। लोगों की व्यस्तताएं बढ़ गई हैं, संवाद सीमित हो गए हैं और सहज मिलना-जुलना कहीं पीछे छूटता प्रतीत होता है। यह सोचकर मन में एक हल्की कसक अवश्य उठती है कि जो चौपाल कभी रिश्तों को जोड़ती थी, उसकी परंपरा अब धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है। लोग आज भले ही उन आत्मीय पलों को भूलकर अपने-अपने संसार में व्यस्त हो गए हों, लेकिन मंगलानंद चाचा और गैणा चाची की उदारता और अपनत्व की छवि आज भी इस बदलते समय में स्मृतियों में उजाला करती है।
मंगलानंद चाचा और चाची गैणादेवी की स्मृतियां आज भी जीवित हैं—हर उस व्यक्ति के हृदय में, जिसने उनके स्नेह को महसूस किया, उनके घर की गर्माहट को जिया और उनकी चौपाल में बैठकर अपनत्व का वास्तविक अर्थ समझा।
वास्तव में, वे केवल एक व्यक्ति या एक परिवार नहीं थे—वे एक भावना थे।
एक ऐसा दौर, जहां रिश्ते बनाए नहीं जाते थे, बल्कि निभाए जाते थे…
और अपनापन केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन का आधार होता था।

दोनों विभूतियों को मेरा नमन 🙏💐

प्रो. (डॉ.) राकेश चन्द्र रयाल (मनरागी)

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