लोक भवन के लोकप्रिय राज्यपाल: उत्तराखंड की स्मृतियों में सदैव जीवंत रहेंगे लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह जी

एक ऐसा व्यक्तित्व, जिसने राजभवन को जनसंवाद, संवेदना और उत्तराखंड की संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया

प्रो. राकेश चन्द्र रयाल (मनरागी)

उत्तराखंड के निवर्तमान राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह जी का व्यक्तित्व मेरे लिए केवल एक संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति का व्यक्तित्व नहीं है, बल्कि एक ऐसे संवेदनशील इंसान का व्यक्तित्व है, जिसने अपने कार्यकाल में देवभूमि उत्तराखंड की धार्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और सामाजिक विशेषताओं को समझने तथा उन्हें व्यापक पहचान दिलाने का प्रयास किया। उनके पांच वर्ष के कार्यकाल की अनेक स्मृतियां राज्य के सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक चर्चा का विषय बनी रहेंगी।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्यपाल का पद संवैधानिक गरिमा, दायित्व और मर्यादा का प्रतीक है। लेकिन जब इस गरिमा के साथ सहजता, आत्मीयता और लोगों से जुड़ने की भावना भी जुड़ जाती है, तब किसी पद पर आसीन व्यक्ति की पहचान उसके पद से आगे बढ़कर उसके व्यवहार और कार्यों से बनने लगती है। मेरे अनुभव में लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह जी के व्यक्तित्व की एक उल्लेखनीय विशेषता यही रही कि उन्होंने उत्तराखंड को केवल एक प्रशासनिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि अपनी विशिष्ट आध्यात्मिक विरासत, समृद्ध लोकसंस्कृति, वीर सैनिक परंपरा और अपार मानवीय संभावनाओं वाले प्रदेश के रूप में देखने का प्रयास किया।
व्यक्तिगत मुलाकातों से बनी एक आत्मीय छवि
मुझे उनके कार्यकाल के दौरान लगभग पांच-छह बार उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने का अवसर मिला। इन मुलाकातों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैलो हल्द्वानी 91.2 एफएम सामुदायिक रेडियो के लिए उनके साथ किए गए साक्षात्कार रहे। एक पत्रकार और संचार के अध्येता के रूप में मेरे लिए ये संवाद केवल औपचारिक साक्षात्कार नहीं थे। इनके माध्यम से मुझे उनके विचारों, उत्तराखंड के प्रति उनकी आत्मीयता और राज्य के विभिन्न पक्षों को समझने की उनकी दृष्टि को निकट से जानने का अवसर मिला।
किसी साक्षात्कार में व्यक्ति के विचारों के साथ-साथ उसकी प्राथमिकताएं, संवेदनाएं और दृष्टिकोण भी सामने आते हैं। लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह जी के साथ संवाद करते हुए मुझे बार-बार यह अनुभव हुआ कि उत्तराखंड की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विविधता, शैक्षिक संभावनाओं, युवाओं की आकांक्षाओं और समाज की चुनौतियों के प्रति उनकी विशेष रुचि थी। उनके संवादों में उत्तराखंड के प्रति लगाव और यहां की विशिष्ट पहचान को समझने की इच्छा दिखाई देती थी।
एक जनसंचारकर्मी के रूप में मेरे लिए यह अनुभव इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि सामुदायिक रेडियो का मूल उद्देश्य समाज की आवाज को मंच देना और संवाद के माध्यम से लोगों को जोड़ना है। जब लोक भवन से जुड़े व्यक्तित्व का संवाद सामुदायिक रेडियो के माध्यम से आम श्रोताओं तक पहुंचता है, तो संवैधानिक संस्थाओं और नागरिकों के बीच संवाद का एक सार्थक माध्यम विकसित होता है।
देवभूमि की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के प्रति अनुराग
उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय की सुंदरता और चारधाम यात्रा तक सीमित नहीं है। यहां की लोकपरंपराएं, लोकभाषाएं, लोकगीत, मेले, पर्व, आस्था के केंद्र और सामुदायिक जीवन की विशिष्टता इसकी सांस्कृतिक आत्मा हैं। इस विरासत को समझना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना किसी भी सार्वजनिक नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण दायित्व है।
लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह जी ने अपने कार्यकाल में उत्तराखंड की आध्यात्मिक विरासत और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े विभिन्न विषयों में रुचि दिखाई। उनके कार्यकाल में लोक भवन केवल औपचारिक कार्यक्रमों का स्थल नहीं रहा, बल्कि शिक्षा, संस्कृति, पर्यावरण, जनकल्याण और सामाजिक सरोकारों से जुड़े अनेक संवादों का भी केंद्र बना।
मेरा मानना है कि किसी राज्य की सांस्कृतिक पहचान को सम्मान देना उसके लोगों के आत्मविश्वास को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय प्रदेश में, जहां प्रकृति और संस्कृति का गहरा संबंध है, यह दृष्टिकोण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
शिक्षा, युवा और नवाचार पर विशेष ध्यान
लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह जी के कार्यकाल में उच्च शिक्षा, शोध, नवाचार और तकनीक के उपयोग को प्रोत्साहित करने से संबंधित कई पहल सामने आईं। विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में उन्होंने उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, पारदर्शिता और शोध को उपयोगी बनाने पर जोर दिया। ‘वन यूनिवर्सिटी–वन रिसर्च’ जैसी पहल के माध्यम से विश्वविद्यालयों के शोध को समाज की वास्तविक आवश्यकताओं से जोड़ने का विचार सामने आया।
किसी भी राज्य का भविष्य उसके युवाओं की शिक्षा, कौशल और अवसरों पर निर्भर करता है। उत्तराखंड के संदर्भ में यह विषय इसलिए भी अहम है, क्योंकि यहां के युवाओं में प्रतिभा और संभावनाओं की कमी नहीं है; आवश्यकता उन्हें बेहतर अवसरों, मार्गदर्शन और नवाचार के अनुकूल वातावरण से जोड़ने की है।
एक शिक्षक और विश्वविद्यालय प्रशासन से जुड़े व्यक्ति के रूप में मैं शिक्षा के इस पक्ष को विशेष महत्व देता हूं। शिक्षा तभी सार्थक बनती है, जब वह ज्ञान के साथ विवेक, कौशल के साथ संवेदनशीलता और शोध के साथ सामाजिक उपयोगिता भी विकसित करे। इस दृष्टि से शिक्षा और नवाचार को लेकर उनके कार्यकाल में हुए प्रयास उल्लेखनीय हैं।
सैनिक परंपरा और सीमांत क्षेत्रों से जुड़ाव
उत्तराखंड वीर सैनिकों की भूमि है। यहां के अनेक परिवारों का भारतीय सेना से गहरा संबंध रहा है। स्वयं भारतीय सेना में लगभग चार दशक तक सेवाएं दे चुके लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह जी के लिए सैनिकों, पूर्व सैनिकों और सीमांत क्षेत्रों से जुड़े विषय स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण रहे।
उनके कार्यकाल में सीमांत गांवों, युवाओं, पूर्व सैनिकों और स्थानीय समुदायों से संवाद की पहल दिखाई दी। सीमांत क्षेत्रों की चुनौतियों को समझना केवल विकास का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, स्थानीय आजीविका और पलायन जैसी समस्याओं से भी जुड़ा हुआ है।
पर्वतीय गांवों में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा युवाओं को अपने क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर देना उत्तराखंड के भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। ऐसे विषयों पर ध्यान केंद्रित करना राज्य की दीर्घकालिक विकास यात्रा के लिए महत्वपूर्ण है।
जनसरोकारों से जुड़ाव ही बनाता है लोकप्रियता
किसी व्यक्ति की लोकप्रियता का आकलन केवल औपचारिक समारोहों, सार्वजनिक उपस्थिति या प्रशंसात्मक वक्तव्यों से नहीं किया जा सकता। उसकी वास्तविक पहचान लोगों के अनुभवों, संवादों और उनके मन में बनी स्मृतियों से भी निर्मित होती है।
मेरे व्यक्तिगत अनुभवों और उनके साथ हुए संवादों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह जी ने अपने कार्यकाल में लोगों से जुड़ने, विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने और उत्तराखंड के विषयों को व्यापक मंच प्रदान करने का प्रयास किया। उनकी सहजता और आत्मीय व्यवहार ने अनेक लोगों के साथ संवाद की संभावनाएं पैदा कीं।
यह कहना कठिन है कि राज्य का प्रत्येक व्यक्ति उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता है, लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि उनके कार्यकाल और सार्वजनिक गतिविधियों ने उत्तराखंड के सामाजिक जीवन में उनकी एक विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी लोकप्रियता के आकलन में उनके प्रति लोगों की व्यक्तिगत स्मृतियों, सार्वजनिक संवाद और कार्यकाल के दौरान सामने आई पहलों को साथ रखकर देखना चाहिए।
विदाई के बाद भी जीवंत रहेंगी स्मृतियां
लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह जी ने 15 सितंबर 2021 को उत्तराखंड के राज्यपाल का पदभार ग्रहण किया और पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने के बाद अक्टूबर 2026 में लोक भवन से विदा हुए। उनके स्थान पर डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने 19 अक्टूबर 2026 को राज्यपाल पद की शपथ ग्रहण की।
पद और दायित्व समय के साथ बदलते रहते हैं, लेकिन उनसे जुड़ी स्मृतियां, संवाद और अनुभव व्यक्ति के साथ बने रहते हैं। मेरे लिए लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह जी के कार्यकाल की स्मृतियों में हैलो हल्द्वानी रेडियो के लिए उनके साथ किए गए साक्षात्कार और उनसे हुई व्यक्तिगत मुलाकातें विशेष स्थान रखती हैं। इन अवसरों पर उत्तराखंड के प्रति उनके विचारों और इस प्रदेश की विविधताओं को समझने की उनकी दृष्टि को निकट से जानने का अवसर मिला।
आज जब वे राज्यपाल के दायित्व से मुक्त होकर विदा हो चुके हैं, तब उनके कार्यकाल का मूल्यांकन केवल उपलब्धियों की सूची के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर भी किया जाना चाहिए कि उन्होंने किन विषयों को प्राथमिकता दी, किन संस्थाओं और समुदायों से संवाद किया तथा राज्य के विकास और सामाजिक सरोकारों को लेकर किस प्रकार की पहल की।
मेरे लिए यह लेख किसी औपचारिक प्रशस्ति से अधिक व्यक्तिगत अनुभवों, संवादों और स्मृतियों की अभिव्यक्ति है। सार्वजनिक जीवन में कुछ मुलाकातें ऐसी होती हैं, जो अपने पीछे केवल परिचय नहीं, बल्कि विचारों और अनुभवों की एक स्थायी छाप छोड़ जाती हैं। लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह जी के साथ हुई मेरी मुलाकातें और हैलो हल्द्वानी रेडियो के लिए किए गए उनके साक्षात्कार ऐसी ही स्मृतियों का हिस्सा हैं।
उत्तराखंड की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत, शैक्षिक आकांक्षाओं और सामाजिक सरोकारों से जुड़े उनके कार्यकाल के अनेक प्रसंग आने वाले समय में भी याद किए जाएंगे। लोक भवन से उनकी विदाई एक संवैधानिक कार्यकाल का समापन है, लेकिन देवभूमि उत्तराखंड से जुड़ी उनकी स्मृतियों और यहां के लोगों के साथ बने आत्मीय संबंधों की कहानी इससे समाप्त नहीं होती।

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