मतलब का दौर…. और सच्चाई पर मौन होता समाज….

डॉ. राकेश चन्द्र रयाल (मनरागी)…….

“मतलब की बात सब समझते हैं, पर बात का मतलब कोई नहीं समझता। जिंदा इंसान को गिराने में और मृत हुए को उठाने में गजब की एकता दिखाते हैं।”

यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि आज के समाज का आईना है। आधुनिक युग ने विज्ञान, तकनीक और संचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन संवेदनाओं, रिश्तों और नैतिक मूल्यों के स्तर पर हम कहीं न कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं। आज हर व्यक्ति बात तो सुनता है, पर उसके पीछे छिपी भावना, पीड़ा और सच्चाई को समझने का धैर्य कम होता जा रहा है।
आज का समय ऐसा हो गया है जहाँ किसी की सफलता से अधिक उसकी असफलता चर्चा का विषय बनती है। किसी व्यक्ति के संघर्ष को समझने से पहले उसके विरुद्ध निर्णय सुना दिया जाता है। सोशल मीडिया ने सूचना को जितनी तेजी दी है, उतनी ही तेजी से अफवाहों, आधे-अधूरे तथ्यों और चरित्र हनन की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा दिया है। किसी को बदनाम करने के लिए लोगों का एक वर्ग तुरंत सक्रिय हो जाता है, लेकिन उसी व्यक्ति की उपलब्धियों या संघर्षों पर वही लोग मौन साध लेते हैं।
विडंबना यह है कि जब कोई व्यक्ति जीवित होता है, तब उसकी आलोचना, उपेक्षा और अवमूल्यन में लोग पीछे नहीं रहते। लेकिन वही व्यक्ति जब इस दुनिया से चला जाता है, तब उसके सम्मान में बड़े-बड़े शब्द, श्रद्धांजलियाँ और स्मृतियाँ प्रस्तुत की जाती हैं। ऐसा लगता है जैसे जीवित व्यक्ति को सम्मान देने में कंजूसी और मृत व्यक्ति को महिमामंडित करने में उदारता दिखाई जाती है।
वर्तमान दौर में “मतलब” ने “मूल्य” की जगह ले ली है। रिश्ते भी अक्सर स्वार्थ की कसौटी पर तौले जाने लगे हैं। जब तक किसी से लाभ है, तब तक उसका साथ है; जैसे ही स्वार्थ समाप्त हुआ, संबंध भी समाप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि विश्वास का संकट गहराता जा रहा है।
समाज की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं कि बुरे लोग बढ़ गए हैं, बल्कि यह है कि अच्छे लोग भी कई बार सत्य के पक्ष में बोलने का साहस नहीं जुटा पाते। झूठ के साथ भीड़ खड़ी हो जाती है, जबकि सत्य अक्सर अकेला रह जाता है। किसी को गिराने के लिए प्रमाण नहीं, केवल आरोप पर्याप्त समझे जाने लगे हैं। यह प्रवृत्ति किसी भी सभ्य समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है।
हमें यह समझना होगा कि किसी व्यक्ति का वास्तविक सम्मान उसके जीवनकाल में उसकी मेहनत, ईमानदारी और योगदान को स्वीकार करने में है, न कि उसके जाने के बाद औपचारिक श्रद्धांजलि देने में। समाज तभी स्वस्थ बनेगा जब हम आलोचना से पहले सत्य की खोज करेंगे, निर्णय से पहले तथ्यों को समझेंगे और किसी को गिराने के बजाय उसे संभालने का प्रयास करेंगे।
आज आवश्यकता केवल तकनीकी प्रगति की नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के पुनर्जागरण की है। यदि हम जीवित लोगों का सम्मान करना, उनकी पीड़ा को समझना और सत्य के साथ खड़े होना सीख जाएँ, तो शायद आने वाली पीढ़ियाँ एक अधिक संवेदनशील और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण कर सकेंगी।

अंततः, समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह मृतकों का कितना सम्मान करता है, बल्कि इस बात से होती है कि वह जीवित लोगों के साथ कितना न्याय, संवेदना और सम्मान का व्यवहार करता है।

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