डळखु — साहस, कौशल और पहाड़ की जिंदगी:- डॉ. राकेश चन्द्र रयाल (मनरागी)

गढ़वाली भाषा के कुछ शब्द ऐसे हैं, जिनमें केवल कोई अर्थ नहीं, बल्कि पहाड़ के जीवन की पूरी तस्वीर समाई होती है। ऐसा ही एक रोचक और अपने भीतर साहस, निडरता तथा कौशल की कहानी समेटे शब्द है— ‘डळखु’।
‘डळखु’ उस अनुभवी और कुशल व्यक्ति या महिला को कहा जाता है, जो बड़े-बड़े पेड़ों की डालियों से होते हुए उनकी चोटी, यानी सबसे ऊपरी हिस्से तक सहजता से चढ़ जाए। इसके लिए केवल शारीरिक ताकत ही पर्याप्त नहीं होती थी; साहस, अनुभव, संतुलन, आत्मविश्वास और पेड़ पर चढ़ने का विशेष कौशल भी जरूरी होता था।
‘डाळू’ गढ़वाली में पेड़ के लिए प्रयुक्त होता है और ‘टुखु’ का अर्थ है—पेड़ की चोटी या सबसे ऊपरी हिस्सा। इस दृष्टि से ‘डळखु’ का सीधा-सा अर्थ हुआ—पेड़ के ‘टुखु’ तक पहुँचने वाला व्यक्ति।
पहाड़ के गांवों में ‘डळखु’ होना कोई मामूली बात नहीं थी। खासकर बड़े पेड़ों से घास काटने के लिए गांव में कुछ महिलाएं और पुरुष इतने कुशल माने जाते थे कि जरूरत पड़ने पर उन्हें विशेष रूप से बुलाया जाता था। बड़े-बड़े आम के पेड़ों से आम तोड़ने का काम भी अक्सर इन्हीं ‘डळखु’ लोगों के भरोसे होता था।
पहाड़ की महिलाओं के दैनिक जीवन में तो यह कौशल लंबे समय तक जीवन की आवश्यकता का हिस्सा रहा। गाय-भैंस, बैल और बकरियों के लिए घास लाना, जंगल से चारा काटना और खेतों में खड़े बड़े पेड़ों से घास निकालना—इन सबकी जिम्मेदारी प्रायः महिलाओं के कंधों पर होती थी। कई बार उन्हें पेड़ की इतनी ऊंची और पतली डालियों तक पहुंचना पड़ता था, जहां एक छोटी-सी चूक भी भारी पड़ सकती थी।
यह काम जितना सामान्य दिखाई देता था, उतना ही जोखिम भरा भी था। जंगल में घास काटते समय कई महिलाएं ढंगार—जिसे गढ़वाली में ‘भ्याळ’ भी कहा जाता है—में गिर जाती थीं। घास का एक और गट्ठर (गडोळी) पाने की चाह में उठाया गया एक कदम कभी-कभी जिंदगी का आखिरी कदम साबित हो जाता था। पहाड़ की स्त्रियों के श्रम, साहस और जोखिम की यह अनकही कहानी आज भी पहाड़ी गांवों की स्मृतियों में बसी हुई है।
मैं भी कभी बहुत ‘डळखु’ हुआ करता था।
स्कूल से लौटते ही घर के पास खेत में खड़ा हमारा बड़ा-सा ‘बंबई आम’ का पेड़ मुझे जैसे अपनी ओर बुलाता था। स्कूल का बैग घर की ओर दूर से ही फेंकता और सीधा आम के पेड़ की चोटी, यानी उसके ‘टुखु’, पर जा चढ़ता। कुछ आम वहीं बैठकर खा लेता और कुछ तोड़कर घर ले आता। उस समय न ऊंचाई का डर था, न गिरने की चिंता—बस पेड़ पर चढ़ने का रोमांच था।
मेरे क्षेत्र का सबसे बड़ा और शायद सबसे कठिन पेड़ था ‘बिल्ली साजआम’।
‘साजआम’ यानी साझी जमीन पर खड़ा आम का पेड़। हमारे यहां ऐसे दो बड़े आम के पेड़ थे—एक ‘मलि साजआम’, यानी ऊपर की तरफ वाला साजआम, और दूसरा ‘बिल्ली साजआम’, यानी नीचे की तरफ वाला साजआम। ये दोनों आम ‘साजी’ थे, अर्थात इन पर गांव के लोगों का सामूहिक अधिकार था।
उन पेड़ों की ऊंचाई और बनावट ऐसी थी कि उन पर चढ़ना हर किसी के बस की बात नहीं थी। जो व्यक्ति वहां तक पहुंचकर उसके ‘टुखु’ तक चढ़ जाता, वही असली ‘डळखु’ कहलाने का हकदार समझा जाता था।
आज गांवों में न तो पहले जैसे बड़े-बड़े पेड़ दिखाई देते हैं और न पेड़ों पर चढ़कर घास काटने तथा आम तोड़ने की वह पुरानी परंपरा। जीवन के साधन बदल गए हैं, पशुपालन का स्वरूप बदल गया है और पहाड़ की दिनचर्या भी काफी बदल चुकी है।
लेकिन ‘डळखु’ जैसा शब्द हमें उस दौर में ले जाता है, जब पहाड़ का जीवन प्रकृति के साथ सीधे जुड़ा हुआ था और साधारण-से दिखाई देने वाले कामों में भी असाधारण साहस छिपा होता था।
‘डळखु’ केवल पेड़ की चोटी तक पहुंचने वाला व्यक्ति नहीं था; वह पहाड़ के श्रम, साहस, अनुभव, संतुलन और आत्मविश्वास का प्रतीक था। विशेषकर उन पहाड़ी महिलाओं के लिए, जिनके लिए पेड़ की ऊंची डालियां, जंगल के रास्ते और खड़ी पहाड़ी की ढलानें रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थीं।
शायद इसीलिए पहाड़ के ऐसे शब्द केवल शब्द नहीं होते बल्कि वे हमारे बीते हुए जीवन की जीवित स्मृतियां होते हैं।

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