डॉ. राकेश चन्द्र रयाल ( मनरागी)
नेपाल में घटित प्राकृतिक त्रासदी ने एक बार फिर मनुष्य को यह सोचने के लिए विवश किया है कि आखिर विकास की हमारी दौड़ हमें किस दिशा में ले जा रही है। पहाड़ों की गोद में बसे नेपाल की प्राकृतिक सुंदरता जितनी मनमोहक है, उतनी ही संवेदनशील भी। भूस्खलन, अतिवृष्टि, बादल फटना, बाढ़ और अचानक आने वाली प्राकृतिक आपदाएँ हमें बार-बार यह चेतावनी देती हैं कि प्रकृति के साथ किया गया खिलवाड़ अंततः मनुष्य के लिए ही संकट बनकर लौटता है।
यह चेतावनी हमारे लिए नई नहीं है। उत्तराखंड ने पिछले कुछ दशकों में प्रकृति की इस भाषा को बेहद करीब से महसूस किया है। 2013 की केदारनाथ आपदा ने पूरे देश को झकझोर दिया था। मंदाकिनी और अलकनंदा घाटी में आई विनाशकारी बाढ़ और भारी वर्षा ने हजारों लोगों के जीवन को प्रभावित किया तथा यह सवाल खड़ा किया कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विकास की हमारी योजनाएँ कितनी वैज्ञानिक और पर्यावरण-सम्मत हैं।
इसके बाद भी हिमालय ने हमें लगातार संकेत दिए। 2021 में चमोली की आपदा, जिसमें ऋषिगंगा और धौलीगंगा घाटी में भारी तबाही हुई, ने पहाड़ों की नाजुक भौगोलिक संरचना की ओर ध्यान खींचा। इसके बाद भी उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में अतिवृष्टि, बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएँ सामने आती रहीं। 2025 में धराली क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ और मलबे की घटना ने एक बार फिर यह प्रश्न हमारे सामने रखा कि क्या हम हिमालय की संवेदनशीलता को पर्याप्त गंभीरता से समझ रहे हैं? थराली सहित चमोली और राज्य के अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में समय-समय पर हुई अतिवृष्टि और भूस्खलन की घटनाएँ भी इसी व्यापक संकट की ओर संकेत करती हैं।
इन घटनाओं को केवल अलग-अलग प्राकृतिक दुर्घटनाओं के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इनके पीछे प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ भूमि उपयोग में बदलाव, अनियोजित निर्माण, नदी-नालों के प्राकृतिक प्रवाह में हस्तक्षेप, वनों पर दबाव और संवेदनशील ढलानों पर बढ़ती मानवीय गतिविधियों जैसे कारकों की भी गंभीरता से पड़ताल आवश्यक है।
प्रकृति अपने नियमों से चलती है। नदियाँ अपने रास्ते स्वयं बनाती हैं, जंगल अपनी सीमाओं में जीवन का संतुलन बनाए रखते हैं और पहाड़ अपनी भौगोलिक संरचना के अनुरूप सदियों से खड़े हैं। समस्या तब शुरू होती है जब मनुष्य सुविधा और अत्याधुनिक विकास की होड़ में प्रकृति की इन प्राकृतिक सीमाओं को बदलने लगता है।
हमने नदियों के किनारे घर बनाए, नदी के प्रवाह क्षेत्र में निर्माण किया, जलधाराओं को संकुचित किया और फिर बाढ़ आने पर नदी को दोष दिया। हमने जंगलों को काटकर बस्तियाँ और सड़कें बनाईं, पहाड़ों को अनियंत्रित ढंग से काटा और फिर भूस्खलन होने पर इसे केवल प्राकृतिक आपदा कहकर आगे बढ़ गए। प्रश्न यह है कि इनमें से कितना वास्तव में प्राकृतिक है और कितना हमारी अपनी गलतियों का परिणाम?
नेपाल की त्रासदियाँ केवल नेपाल की चिंता नहीं हैं। भारत के हिमालयी राज्य उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के पर्वतीय क्षेत्र—सभी के लिए इनमें एक गंभीर संदेश छिपा है। उत्तराखंड की अपनी आपदाओं ने भी बार-बार सिद्ध किया है कि हिमालय सामान्य भौगोलिक क्षेत्र नहीं है। यहाँ विकास के लिए मैदानों की तरह वही नियम लागू नहीं किए जा सकते।
विकास आवश्यक है, लेकिन विकास का अर्थ प्रकृति को समाप्त करना नहीं हो सकता।
सड़कें चाहिए, पुल चाहिए, अस्पताल चाहिए, विद्यालय चाहिए, पर्यटन चाहिए और आधुनिक सुविधाएँ भी चाहिए। लेकिन इन सबके निर्माण की अपनी वैज्ञानिक और पर्यावरणीय सीमाएँ होनी चाहिए। हमें यह तय करना होगा कि विकास प्रकृति की कीमत पर होगा या प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए।
नदियों को केवल पानी की धारा समझना हमारी सबसे बड़ी भूल है। नदी के साथ उसका पूरा नदी-तंत्र जुड़ा होता है, उसका जलग्रहण क्षेत्र, बाढ़ क्षेत्र, सहायक धाराएँ और प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र। यदि हम नदी की भूमि पर अतिक्रमण करेंगे, उसके रास्ते को रोकेंगे या उसे कृत्रिम रूप से संकुचित करेंगे तो किसी न किसी दिन पानी अपना रास्ता वापस खोजेगा। उस समय हमारी बनाई हुई दीवारें, सड़कें और इमारतें उसके सामने कमजोर पड़ सकती हैं।
इसी तरह जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं। वे पहाड़ों की मिट्टी को थामते हैं, वर्षा के पानी को नियंत्रित करते हैं, जलस्रोतों को जीवन देते हैं और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखते हैं। जंगलों की भूमि पर अतिक्रमण करके हम केवल पेड़ नहीं काटते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा भी कमजोर करते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम ‘प्रकृति पर विजय’ की मानसिकता से बाहर निकलकर ‘प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व’ की सोच विकसित करें।
हमें अपनी सीमाओं में रहकर विकास के रास्ते खोजने होंगे। इसका अर्थ विकास रोकना नहीं, बल्कि संतुलित, वैज्ञानिक और जिम्मेदार विकास करना है। पहाड़ों में निर्माण की ऊँचाई, सड़क निर्माण की तकनीक, ढलानों की स्थिरता, नदी से दूरी, जंगलों की सुरक्षा और आपदा-संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण, इन सभी विषयों पर कठोर नियम होने चाहिए और उनका ईमानदारी से पालन भी होना चाहिए।
विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में किसी भी बड़ी विकास परियोजना से पहले केवल आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि उसकी वहन क्षमता (carrying capacity), पर्यावरणीय प्रभाव, भूगर्भीय संवेदनशीलता और आपदा जोखिम का वैज्ञानिक मूल्यांकन अनिवार्य होना चाहिए।
सिर्फ सरकारों की जिम्मेदारी से यह काम पूरा नहीं होगा। स्थानीय प्रशासन, वैज्ञानिक संस्थाएँ, निर्माण एजेंसियाँ, उद्योग, पर्यटन क्षेत्र और आम नागरिक—सभी को अपनी भूमिका समझनी होगी। हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि प्रकृति के संकेतों की अनदेखी करके किया गया विकास लंबे समय में विकास नहीं, बल्कि विनाश का कारण बन सकता है।
नेपाल की त्रासदी को डराने वाली घटना के रूप में नहीं, बल्कि हमें जगाने वाली चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। उत्तराखंड की केदारनाथ से लेकर चमोली, धराली, थराली और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों की घटनाएँ भी हमें यही संदेश देती हैं कि हिमालय के साथ व्यवहार करते समय हमें अपनी विकास की भाषा और प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा।
हमें पहाड़ों को पहाड़ ही रहने देना होगा, नदियों को नदी की तरह बहने देना होगा और जंगलों को जंगल की तरह साँस लेने देना होगा।
हम प्रकृति के मालिक नहीं हैं; हम उसी प्रकृति का हिस्सा हैं।
यदि हम अपनी सुविधाओं के लिए प्रकृति की सीमाएँ तोड़ते रहेंगे तो एक दिन वही प्रकृति अपनी सीमाएँ हमें याद दिलाएगी। इसलिए आज जरूरत है कि हम विकास की परिभाषा को नए सिरे से समझें—ऐसा विकास जो वर्तमान की जरूरतें पूरी करे, लेकिन भविष्य की पीढ़ियों के अधिकार और प्रकृति के अस्तित्व को खतरे में न डाले।
प्रकृति हमें रोक नहीं रही है, वह हमें रास्ता दिखा रही है। जरूरत केवल इतनी है कि हम उसकी भाषा समझें।
नेपाल की त्रासदी और उत्तराखंड की आपदाओं से हमें यही सीख लेनी चाहिए,
नदियों के रास्ते न रोकें।
जंगलों की जमीन न छीनें।
पहाड़ों की संरचना से खिलवाड़ न करें।
आपदा-संवेदनशील क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण न करें।
और विकास की दौड़ में प्रकृति की सीमाओं को न लांघें।
क्योंकि प्रकृति के साथ चलकर किया गया विकास ही वास्तविक विकास है, और प्रकृति के विरुद्ध किया गया विकास अंततः विनाश का दूसरा नाम बन सकता है।
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