जयपुर। जयपुर से प्रकाशित द्विभाषी शोध पत्रिका ‘कम्युनिकेशन टुडे’ तथा भारती विद्यापीठ इंस्टीट्यूट ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशन्स एंड मैनेजमेंट, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 242वीं राष्ट्रीय वेबिनार में ‘पर्दे पर जेंडर विविधता: सामाजिक यथार्थ और सिनेमाई कल्पना के बीच’ विषय पर विमर्श हुआ। वक्ताओं ने सिनेमा में विविध जेंडर पहचानों के संवेदनशील और सम्मानजनक चित्रण की आवश्यकता रेखांकित की।
मुख्य वक्ता ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय, लखनऊ के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की सहायक आचार्य एवं प्रभारी डॉ. रुचिता सुजय चौधरी ने कहा कि सिनेमा सामाजिक धारणाओं को प्रतिबिंबित करने के साथ उन्हें प्रभावित भी करता है। जेंडर भूमिकाएं सामाजिक संरचनाओं से निर्मित होती हैं। उन्होंने जैविक लिंग, जेंडर पहचान और यौन अभिरुचि के बीच अंतर समझने तथा पूर्वाग्रहों से मुक्त दृष्टि विकसित करने पर जोर दिया।
उन्होंने ‘राजा हिंदुस्तानी’, ‘सड़क’ और ‘दोस्ताना’ जैसी फिल्मों के उदाहरणों से रूढ़ छवियों की चर्चा की। वहीं ‘अलीगढ़’, ‘तमन्ना’ और ‘माय ब्रदर निखिल’ के संदर्भ में मानवीय संघर्ष, पारिवारिक स्वीकार्यता और सामाजिक समावेशन के पहलुओं को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि समुदायों के अनुभव समझने में जाति, वर्ग, धर्म और आर्थिक परिस्थितियों की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।
ओटीटी के संदर्भ में उन्होंने कहा कि दृश्यता बढ़ना सकारात्मक है, लेकिन प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है। पात्रों को बाजारू आकर्षण बनाने के बजाय उनके जीवन, शिक्षा, रोजगार और संबंधों की वास्तविक चुनौतियों को सामने लाना जरूरी है। उन्होंने कैमरे के पीछे की दृष्टि तथा कथानक में संबंधित समुदायों की आवाज पर भी प्रश्न उठाए।
विषय प्रवर्तन करते हुए राजस्थान विश्वविद्यालय के जनसंचार केंद्र के पूर्व अध्यक्ष एवं कम्युनिकेशन टुडे के संपादक प्रो. संजीव भानावत ने कहा कि जेंडर विविधता का प्रश्न केवल पात्रों की संख्या का नहीं, बल्कि उनकी गरिमा, स्वायत्तता और अनुभवों को समझने का है। ट्रांसजेंडर अथवा समलैंगिक पात्रों को हास्य, भय, दया और सनसनी तक सीमित करना उनकी मानवीय पहचान को संकुचित करता है। उन्होंने विमर्श को पुरुष बनाम महिला बनाने से बचने का आग्रह किया।
चर्चा में मेरठ के मीडिया शिक्षाविद् डॉ. सूरज देव प्रसाद ने महिलाओं के अधिकारों, बदलते सामाजिक मूल्यों और नई पीढ़ी की भूमिका पर विचार रखे। संवाद में शिक्षा, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और पितृसत्तात्मक सोच से मुक्ति को सशक्तिकरण का आधार बताया गया।
वेबिनार संयोजिका एवं भारती विद्यापीठ की मीडिया शिक्षिका सुश्री प्रियंका सिंह ने वंदना प्रस्तुत की तथा आभार व्यक्त किया। आयोजन की सफलता में जयंत राठी, पुष्पेंद्र सिंह, श्रीकांत सिंह (भारती विद्यापीठ) तथा डॉ. पृथ्वी सेंगर (आईआईएमटी विश्वविद्यालय, मेरठ) का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
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