निस्वार्थ सेवा, समर्पण और राष्ट्रभक्ति से संगठन को दी मजबूती; क्षेत्र की राजनीतिक यात्रा में हमेशा याद किए जाएंगे उनका योगदान
यमकेश्वर। उत्तराखंड के यमकेश्वर क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की संगठनात्मक नींव मजबूत करने वाले शुरुआती कार्यकर्ताओं में स्वर्गीय विनय रतूड़ी का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने उस दौर में संगठन को खड़ा करने के लिए अपना जीवन, समय, संसाधन और सामर्थ्य समर्पित किया, जब पर्वतीय क्षेत्रों में भाजपा के लिए जनाधार तैयार करना बेहद चुनौतीपूर्ण था। वह केवल एक राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि विचारधारा के प्रति समर्पित ऐसे कर्मयोगी थे, जिन्होंने निस्वार्थ भाव से संगठन की जड़ों को सींचा।
स्व. विनय रतूड़ी का जन्म 14 फरवरी 1963 को पौड़ी गढ़वाल जनपद के यमकेश्वर क्षेत्र के जिया दमराड़ा गांव में हुआ था। उनके पिता विद्यादत्त रतूड़ी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे और उत्तरकाशी से पौड़ी तक विभिन्न शिशु मंदिरों के व्यवस्थापक के रूप में कार्य करते रहे। पिता से मिले संस्कारों ने विनय रतूड़ी के भीतर भी राष्ट्रसेवा और संगठन के प्रति समर्पण का भाव विकसित किया। उनकी इंटरमीडिएट, स्नातक और परास्नातक तक की शिक्षा उत्तरकाशी में हुई। एमएससी करने के बाद वह वहीं इंटरमीडिएट के विद्यार्थियों को पढ़ाने लगे।
राजनीति और संगठन के प्रति उनकी सक्रियता धीरे-धीरे बढ़ती गई। वर्ष 1989-90 के आसपास जब पर्वतीय क्षेत्रों में भाजपा अपने संगठन का विस्तार कर रही थी, तब यमकेश्वर और तत्कालीन लैंसडाउन विधानसभा क्षेत्र में पार्टी की गतिविधियां सीमित थीं। ऐसे समय में स्व. विनय रतूड़ी ने महिमानंद भट्टकोटी, स्व. मोहनलाल बौंठियाल, स्व. दौलतराम बड़ोला और स्व. लाखन सिंह नेगी जैसे कार्यकर्ताओं के साथ संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी संभाली। तत्कालीन संगठनात्मक व्यवस्था में गठित प्रथम संयोजक मंडल के पांच सदस्यों में वह सबसे कम उम्र के सदस्य थे। बाद में महावीर प्रसाद कुकरेती सहित कई अन्य कार्यकर्ता भी संगठन से सक्रिय रूप से जुड़े।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय वर्ष प्रशिक्षित स्वयंसेवक स्व. विनय रतूड़ी को यमकेश्वर क्षेत्र का प्रथम खंड कार्यवाह होने का गौरव प्राप्त हुआ। वह लोगों को संघ की विचारधारा से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयासरत रहते थे। उनकी कार्यशैली का एक उल्लेखनीय उदाहरण जिया दमराड़ा के निकटवर्ती गांव के सेवानिवृत्त व्यक्ति प्रताप सिंह बिष्ट से जुड़ा है। बताया जाता है कि जब बिष्ट ने किसी अन्य राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ली, तब विनय रतूड़ी ने उनसे कोई विवाद या विरोध नहीं किया। इसके बजाय वह नियमित रूप से उनके घर पांचजन्य पत्रिका पहुंचाने लगे। कई महीनों तक यह क्रम जारी रहा। पत्रिका के अध्ययन से प्रभावित होकर प्रताप सिंह बिष्ट संघ से जुड़ गए और आगे चलकर यमकेश्वर के प्रथम खंड कार्यवाह बने। यह प्रसंग विनय रतूड़ी की धैर्यपूर्ण और संवाद आधारित संगठनात्मक शैली को दर्शाता है।
उनके साथी और वरिष्ठ भाजपा कार्यकर्ता पंडित महिमानंद भट्टकोटी बताते हैं कि उस दौर में संगठन के विस्तार के लिए कार्यकर्ताओं को गांव-गांव जाना पड़ता था। बैठकों, रात्रि चौपालों और सदस्यता अभियानों का आयोजन करना आसान नहीं था। स्व. विनय रतूड़ी इन सभी गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। उन्होंने अपना निजी वाहन, आवासीय परिसर, भोजन और अन्य संसाधन संगठन के लिए उपलब्ध कराए। कार्यकर्ताओं के ठहरने से लेकर बैठकों और चुनावी कार्यक्रमों की व्यवस्थाओं तक में वह हमेशा आगे रहते थे।
पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष एवं सहकारी क्षेत्र में प्रदेश स्तर पर दायित्व निभा चुके महावीर प्रसाद कुकरेती भी उनके योगदान को याद करते हुए बताते हैं कि भाजपा के शुरुआती वर्षों में पर्वतीय क्षेत्रों में सदस्य बनाना और संगठन खड़ा करना बड़ी चुनौती थी। गांवों में रात्रि चौपाल लगाकर लोगों को पार्टी से जोड़ने का काम किया जाता था। ऐसे प्रत्येक अभियान और कार्यक्रम की व्यवस्था में विनय रतूड़ी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहती थी।
स्व. रतूड़ी केवल संगठनात्मक गतिविधियों तक सीमित नहीं थे। सनातन हिंदू नववर्ष के अवसर पर कलश यात्राओं और हिंदू जागरण के कार्यक्रमों के आयोजन के लिए वह लंबे समय तक व्यक्तिगत प्रयास और आर्थिक सहयोग करते रहे। जनगीतों के माध्यम से लोगों को जागरूक करना और युवाओं को संगठन से जोड़ना उनकी विशेष पहचान थी। वर्ष 1991 में श्रीनगर के लाल चौक पर भाजपा द्वारा तिरंगा फहराने के ऐतिहासिक कार्यक्रम में भी वह संगठन के सदस्य के रूप में सहभागी रहे।
उनके परिजनों के अनुसार, जीवन के अंतिम समय में अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान भी उनके मन में राष्ट्र और संगठन के प्रति समर्पण का भाव बना रहा। दुर्भाग्यवश, जब वह प्रदेश स्तर पर अपनी पहचान स्थापित कर रहे थे, तभी असमय उनका निधन हो गया। यमकेश्वर में भाजपा और संघ के शुरुआती विस्तार में उनका योगदान आज भी पुराने कार्यकर्ताओं की स्मृतियों में जीवंत है।
स्व. विनय रतूड़ी की विरासत को आज उनकी पत्नी डॉ. मीरा रतूड़ी आगे बढ़ा रही हैं। वह सामाजिक और जनसेवा के कार्यों में सक्रिय रहते हुए अपने पति के सपनों और सेवा भाव को साकार करने का निरंतर प्रयास कर रही हैं। क्षेत्र में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है।
यमकेश्वर में भाजपा की आज की संगठनात्मक मजबूती के पीछे जिन शुरुआती कार्यकर्ताओं का संघर्ष, त्याग और समर्पण रहा, उनमें स्व. विनय रतूड़ी का योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने पद और प्रतिष्ठा से अधिक संगठन को महत्व दिया। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि किसी विचार और उद्देश्य के प्रति सच्चा समर्पण बड़े संसाधनों का नहीं, बल्कि मजबूत संकल्प, निरंतर परिश्रम और निस्वार्थ सेवा का मोहताज होता है।
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